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Sunday, April 23, 2017

Humanity ashamed,not the people of India! Palash Biswas

Humanity ashamed,not the people of India!

Palash Biswas

Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1692450647450004/?l=4428451761847766847


Not very long ago,India remained an agrarian society with agrarian economy.Socialism meant Green Revolution. Irrespective of caste, religion, race, language, region, celebration of life meant a common culture deeply rooted in rural India which was defined as Swraj!But we sacrificed the Agrarian India on the altar of free market economy only 25 years ago and agrarian growth rate reduced to near zero. nWe wanted a consumer market and a service oriented economy in which the state and the government elected by the people should be managers of the global corporate companies.The task had to accomplished with religious ritual of vedic racist sacrifice tradition of the caste,calss race hegemony ruling India.

Hence,the cashless digital India means ethnic cleansing of the agrarian communities ie SC,ST,OBC and minorities the majority rooted in rural India and mass nuclear destruction of rural India to make in an oversmart India with readjustment of demography with pure blood.

It is happening and the it is systematic strategic selling off the natural resources owned and defended by agrarian communities.

Thus,the ruling class and its policy making governance bodies never care to address the agrarian crisis created by themselves.

The agrarian crisis rather has become a magical wand with inherent inequality and injustice to sustain the hegemony rule.

We have seen prime ministers belonging to agrarian communities time and again,majority ministers in center and states,CMs and politicians speaking aloud about the wellness of peasantry who have been blasting the peasantry with their political might.

Earth day celebrated as the Nation has no sympathy with the peasantry!They represent the Earth under monopolistic racist fascist aggression unabated!Those naked peasants on Jantar Mantar and shameless political class and the intelligentsia speaking on earth and environment have not the courage to stand with those naked humanity who feed us with the growth of the soil.Democracy and justice witness ding urine by the helpless producers as the consumers captured everything with their purchasing capacity and the peasantry is subjected to ethnic cleansing!

It seems rather  like a magic show to attract the audience as the peasantry has no space to raise their voice.The Jantar Mantar show evented for the media representes the helplessness of the majoority Indian citizens belonging to Indian peasantry.

Earth might not sustain itself if the peasantry is killed by the Global oreder of ethnic cleansing!


From Wikipedia, the free encyclopedia:

In 2014, the National Crime Records Bureau of India reported 5,650 farmer suicides.[1] The highest number of farmer suicides were recorded in 2004 when 18,241 farmers committed suicide.[2] The farmers suicide rate in India has ranged between 1.4 and 1.8 per 100,000 total population, over a 10-year period through 2005.[3]

India is an agrarian country with around 70% of its people depending directly or indirectly upon agriculture. Farmer suicides account for 11.2% of all suicides in India.[1] Activists and scholars have offered a number of conflicting reasons for farmer suicides, such as monsoon failure, high debt burdens, government policies, public mental health, personal issues and family problems.[4][5][6] There are also accusation of states manipulating the data on farmer suicides.[7]


पेशे से पत्रकार आशुतोष मिश्रा ने किसानों के मूत्रपान करने की ख़बर शेयर करते हुए पूछा है, 'हिंदुओं के साथ इतना अन्याय! कहां गए धर्म के रक्षक जो गरीब हिंदू किसानों के लिए आगे नहीं आ रहे?'


जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने किसानों के मूत्र पीने की ख़बर को शेयर करते हुए ट्वीट किया, 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वे कहां हैं…

Raavenraj Sayam Koitoor जंतर मंतर पर किसानो ने मूत्र पिया।

आरक्षण और मेहनत से अफसर बने किसान पुत्र और किसान के दम भरने वाले नेताओं को सांप सूंघ गया।

आक्रोश की चिंगारी उठने लगी है

संभल जाओ वरना कुछ नहीं बचेगा।

तुम्हारे महल राख हो जाएगें।

धरती पुत्र है धरती जैसा दिल है किसानो का सब सहते है।भूकंप आया ना तो तुम्हारी ऊंची ऊँची हवेलियां मिट्टी में मिल जाएगी।



पिछले एक महीने से देश के राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे तमिलनाडु के किसानों ने शनिवार को मांगें नहीं माने जाने पर नाराजगी जाहिर करते हुए मूत्र पिया। सूखे की मार झेल रहे तमिलनाडु के किसान केंद्र सरकार से कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं। किसान 38 दिनों से केंद्र से कर्जमाफी और वित्तीय सहायता की मांग के साथ धरने पर हैं। सरकार और प्रशासन का ध्यान अपनी बदहाली की ओर खींचने के लिए गले में खोपड़ी पहनने से लेकर सड़क पर सांभर-चावल और मरे हुए सांप-चूहे खाने तक, इन किसानों ने कई सांकेतिक तरीकों का सहारा लिया। हालांकि सरकार ने किसानों के इस प्रदर्शन को लेकर आंख-कान बंद कर रखे हैं। सरकार की ओर से अभी उन्हें किसी तरह की मदद का आश्वासन नहीं दिया गया है।

शनिवार को किसानों द्वारा प्रदर्शन के दौरान मूत्र पीने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोग इनके समर्थन में खड़े हो गए हैं। वहीं, कई यूजर्स ने किसानों की मदद न करने पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार को फटकारा है तो कुछ लोगों ने पीएम मोदी से इनकी मदद करने की अपील की है। कुछ यूजर्स ने सरकार और पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए शर्म करने को कहा है।

आंदोलन की अगुआई कर रही नेशनल साउथ-इंडियन रिवर्स लिंकिंग फार्मर्स असोसिएशन के स्टेट प्रेजिडेंट पी.अयाकन्नू ने कहा था कि हमें पीने के लिए तमिलनाडु में पानी नहीं मिल रहा है और पीएम नरेंद्र मोदी इसकी अनदेखी कर रहे हैं, तो हमें अब अपने मूत्र से ही प्यास बुझानी पड़ेगी। प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है, 'हम लोगों को नजरअंदाज करके मोदी ने बता दिया कि वह हम लोगों को दिल्ली से भगाना चाहते हैं, कभी-कभी तो हमें लगता है कि इससे अच्छा तो हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाए।' इसके साथ ही किसानों ने शनिवार को मूत्र पीने के साथ ही कहा कि सरकार ने हमारी मांग पर ध्यान नहीं दिया तो रविवार को अपना मल खाएंगे।

इस सिलसिले में स्त्री काल के संपादक संजीव चंदन का मंतव्य गौरतलब हैः

अब किसानों को न्याय मिल जायेगा क्योंकि अब साहित्यकर भी 41वें दिन संवेदित हो गये हैं।

आखिरकार स्कूल की लड़ाई लड़ते, हिंदी के साहित्यकारों के प्रिय पत्रकार , श्री रवीश कुमार ने किसानों के संघर्ष पर प्राइम टाइम कर दिया । बस साहित्यकार भी संवेदित हो गए। उसके पहले रवीश जी जब स्कूलों को ठीक करने में लगे थे, तो बीच-बीच में दूसरे चैनलों पर कटाक्ष भी करते जा रहे थे कि वे गाय, हिन्दू-मुसलमान या मंदिर-मस्जिद कर रहे होंगे।

वैसे तमिलनाडु वाले किसान, पाठ्यपुस्तकों वाले निरीह किसान नहीं हैं। कभी भाजपा के तमिलनाडु में कार्यकर्ता रहे इन किसानों के नेतृत्व को यह पता है कि मीडिया तमाशा पसन्द है, तमाशा के बाद ही वे कवरेज देते हैं। योगी-मोदी में लगे मीडिया को अपने जरूरी मुद्दों के प्रति आकर्षित करने के लिए उन्हें 40 दिन से तरह-तरह के इवेंट करने पड़ रहे हैं। क्योंकि सरकार मीडिया में हंगामे के बाद ही सुनती है। इंडियन एयरलाइंस में हंगामा करने वाले शिवसैनिक सांसद को सरकार ने सबक सिखवा दिया और सहारनपुर में बड़े पुलिस अधिकारी के घर तोड़-फोड़ करने वाले भाजपा सांसद पर चुप्पी साध ली।

दिल्ली में अजीबोगरीब इवेंट के साथ आंदोलन करते किसान मीडिया को कमोवेश अपनी ओर खींच ही ले रहे-अब जब किसान कपड़े उतार देगा रायसीना पर, अपना ही पेशाब पीने लगेगा जंतर-मंतर पर तो झक मारकर कवरेज करियेगा ही, हजारो किसान की मौत संवेदित न करती हो तो भी। इस तरह के इवेंटमय आंदोलन किसान विदर्भ में कई बार करते रहे हैं।

कुछ साल पहले उन किसानों के घर और उन गांवों में जाना हुआ था , जहां क्रमशः सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के जाने के बाद बड़ा मीडिया इवेंट बना था। जहां सोनिया गईं, जिस किसान विधवा को एक लाख का चेक दिया था, उसकी समस्या ज्यों की त्यों थी, उसके खेत गांव के नाले में डूबते थे, फसल नष्ट होता था, यथावत रहा सबकुछ । राहुल की पोस्टर वुमन विधवा किसान कलावती के एक और किसान दामाद ने आत्महत्या कर ली थी। और मनमोहन सिंह के जाने के पहले तक , जिस वायफड़ गाँव मे एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की थी , वहां दो-दो किसानों ने आत्महत्या कर ली ।

तो हे संवेदित मित्रों , जब तक कृषि मजदूरों को स्कीलड श्रमिक का दर्जा नहीं मिलेगा, जब तक उनके फसल का उचित दाम नहीं मिलेगा, जिसके लिए कुछ आपको भी योगदान करने होंगे, यानी खाद्य पदार्थों के लिए अधिक भुगतान करना होगा, जबतक समग्र नीति नहीं बनेगी, तबतक आपको किसान बेचारे अपने इवेंट से संवेदित करते रहेंगे, क्योंकि उनके मरने से वैसी संवेदना कहां जाग पाती है!

Peasants committing suicides are cowards and criminals — said BJP minister

हाल में नई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की रैली में भी एक किसान की खुदकशी पर हंगामा बरपा था।फ्लैश बैक में इसे भी सोशल मीडिया के सौजन्य से देख सकते हैंः

Gajendra Singh, a farmer from Rajasthan, his crops ruined by rains, hanged himself from a tree at an AAP rally here on 22 April just before Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal addressed thousands against the controversial land ordinance. The unfortunate event was captured live by the electronic media. It took place at Jantar Mantar in the heart of the city where thousands from Delhi and other states had turned up to denounce the land bill at a mass meeting called by the AAP. A suicide note in Hindi found at the spot said the man was taking his life because untimely rains had destroyed his crops and ruined him. Immediately after the incident, political blame game ensued with the leaders of various ruling parties slinging mud at each other for the heart-rending incident.

But the most 'startling" comment came from O P Dhankar, BJP agriculture minister of Haryana. He described the peasants who commit suicide as cowards and criminals not worthy of help from the government. Playing a second fiddle to such politicians devoid of conscience are the self-styled economists in the pay roll of the ruling monopolists. Swaminathan A Aiyer wrote in his column in the Times of India dated 10 May 2015 that "Everybody loves farm suicides" because "Many states now compensate suicide-hit families, delighting moneylenders who had lent to these families and can now use muscle to claw back their dues from the compensation money." He further added that "presenting farm suicides as a single mass tragedy can win awards for journalists, TRPs for TV anchors, donations for NGOs opposing commercial crops and globalization, slogans for leftists attributing everything to class war, and votes for opposition parties." So the media, according to him, is highlighting farm suicides. This "erudite" person has then made a comment that would make even a donkey laugh. "The overwhelming cause of suicide is mental stress, not financial stress. Many suicides (notably in Andhra Pradesh) were of farmers who borrowed heavily to drill tubewells that quickly ran dry. Free electricity in many states (including AP) has greatly lowered water tables, ruining tubewells. Thus ''free electricity causes suicide", observes this 'celebrated economist-columnist'. The government might think of awarding a higher "Padma" award to him for such path-breaking discoveries.

On the other hand, Dhankar who earlier headed the BJP's Kisan Cell, and is on record to have condemned the previous UPA government for not doing enough for farmers, denied that any farmer had committed suicide due to crop damage. But the fact is that after scores of debt-ridden farmers saw their winter crops damaged by unseasonal hailstorms and rains in states such as Rajasthan, Uttar Pradesh, Haryana and Punjab, there were reports of a string of suicides. The governments irrespective of hues whose brazenly anti-peasant policies have pushed the poverty-stricken hapless peasants to take recourse to such extreme steps are unfazed. On top of it, politicians like Dhankar who have ridden to power with the backing of the exploitative monopolists and are committed to serve their sinister class interest as their faithful subservient and in exchange are allowed to enjoy pelf and power do not feel even a fig ashamed for making such most atrocious remarks.

As per the latest report, one peasant commits suicide in every 38 minutes, 47 in a day. The overall number of peasants' suicide has crossed 3 lakhs. And power-greedy anti-people bourgeois politicians like Dhankar have gone to the extent of even shunning the typical hoodwinking practice of the hypocrites to shed crocodile tears for public consumption and instead have been showing audacity to pass such derogatory remarks against the wretched impoverished pauperized peasants who being unable to secure any help or assistance from the power that be are ending their lives en masse. Time has come when the destitute peasants must understand that committing suicide would allow these heartless spineless politicians to thrive and prosper at their cost. They must close their ranks and unleash a massive organized movement to force the autocratic government yield to their righteous demand to live and dislodge persons like Dhankar from the public offices



Saturday, April 22, 2017

Government of India reduced to a security agency working in foreign interest.Rare kind of racist fascist patriotism! Palash Biswas

Government of India reduced to a security agency working in foreign interest.Rare kind of racist fascist patriotism!
Economic reform unprecedented at the cpst of security and integrity of India.The policy making and governance in anti national mode in the times of bigotry inflicted blind nationalism!
Palash Biswas 
Economic reform unprecedented at the cpst of security and integrity of India.The policy making and governance in anti national mode in the times of bigotry inflicted blind nationalism!
They have the mandate to sell off India like any PSU!
India encouraging global defence companies to set up units: Arun Jaitley says.Thus the security,sovereignty and unity have been handed over to global private companies and foreign interests.Rare performance of racist fascist patriotism which reduces the government of India into a security agency working for foreign interests.

Thus,the Union Finance Minister was given additional charge of Defence Ministry after Manohar Parrikar was made the Chief Minister of Goa.

India is formulating policy to help major global defence companies set up manufacturing units in the country in collaboration with Indian firms, Finance Minister Arun Jaitley said today. 

"Under our changed policy, we are in the future going to concentrate not merely in buying from the rest of the world, but encouraging global defence majors in collaboration with Indian companies to set up manufacturing units in India," Jaitley said at a reception hosted by India's Ambassador to the US Navtej Sarna.

Jaitley, who holds the additional charge of the Defence Ministry, said the Union Government has made the initial policy changes while some more are being planned. 

"Hopefully in the years to come, the impact of this change as far as defence manufacturing policy is concerned would be visible in India. It is receiving a good response from major manufacturers," Jaitley said without giving any details. 

Jaitley was given the additional charge of the Defence Ministry apart from the Ministry of Corporate Affairs after his predecessor Manohar Parrikar was made the Chief Minister of Goa.

Using cricket lingo, he described himself as the "night watchman" for these two ministries. "One of my principal responsibilities is to look after the finances of the government. There are some additional responsibilities that keep coming," he said. 

"In the US you do not have much of cricket. In India it is our favourite game. In the game of cricket, we call it night watchman," he said, referring to his dual role.

"The Prime Minister has asked me to fill in that role in some other departments. But my principal requirement is in finance," Jaitley said. 

Jaitley, leading an Indian delegation, arrived here on April 20, to attend the annual Spring meetings of the International Monetary Fund and the World Bank. 

In addition to his meetings and presentations at the annual Spring meetings of the IMF and the World Bank, Jaitley is also scheduled to attend meetings of other multilateral forums including that of the G-20 finance ministers.

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख अडवाणीजी 6 दिसंबर को शौर्य दिवस मनाएंगे कि नहीं

सस्ती दरों पर मछली उपलब्ध कराएगी भाजपा सरकार

गोवा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार मछली खरीद पर अनुदान देगी। इस आशय की घोषणा गोवा के कैबिनेट मंत्री विनोद पालिएंकर ने की...

http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/fish-crisis-goa-cabinet-minister-vinod-palyekar-fish-at-cheap-rates-13936

छात्र विरोधी यूजीसी गजट के खिलाफ आंदोलन : बहुजन छात्रों को प्रताड़ित कर रहा कुलपति

जेएनयू के छात्र पूरे देश के विश्वविद्यालयों में घूमकर छात्र-नौजवानों को एकजुट कर रहे हैं। बिहार में इस मुहिम का पहले चरण की शुरूआत हो रही है।...

http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/jnu-student-ledear-prashant-nihal-mulayam-singh-birendra-kumar-13935

जब गृह मंत्री को कहना पड़ा कश्मीरी भी भारत के ही नागरिक हैं

देश में कश्मीरियों को लेकर जिस तरह ही नफरत सामने आ रही है उसको लेकर गृह मंत्रालय भी सतर्क हो गया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सभी राज्यों को एडवायजरी जारी की है।...

http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/mewar-university-of-rajasthan-assault-with-kashmiri-students-13934

अडवाणीजी 6 दिसंबर को शौर्य दिवस मनाएंगे कि नहीं

बाबरी मस्जिद : इस की पीड़ा कितनी गहरी होगीये तो आडवाणी ही जानते हैं। मरने के बाद पीछे क्या होता हैकिसी ने नहीं देखा, ...

http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/guestwriter-advaniji-december-6-shaurya-divas-babri-masjid-bjps-top-man-13933

Please save the universities

understand the unprecedented critical juncture after the Rohit Vemula and Najib and Hok Kolorob movements as every university campus has been targeted and inflicted....

http://www.hastakshep.com/englishopinion/please-save-the-universities-wardha-hindi-university-13938

Modi Government Approaches S.C. for Permission to Kill Innocent Citizens with Impunity

government is asking the apex court to recall its order with the aim of giving a free hand to the police and security forces to kill innocent citizens in the name of national security. ...

http://www.hastakshep.com/englishopinion/modi-government-approaches-sc-for-permission-to-kill-innocent-citizens-13932

BJP's Double Speak on Beef

Despite the loud voice duet on cow slaughtering Bhagva Brigade is completely getting unmasked in northeast Indian states. After making a manipulated entry into the Northeast ...

http://www.hastakshep.com/englishopinion/bjp-double-speak-on-beef-13928


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Friday, April 21, 2017

Please save the universities! Palash Biswas


Please save the universities!
Palash Biswas
Video embedded:
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I am very worried with the unexpected gender conflict situation in University campus countrywide.As the girl students were leading the student movement with the male students and even some of them kissed each other publicly to protest intolerance,hate campaign and racist attacks by the fascist forces misusing identities,this sitaution seems rather inserted within every campus to stop the newly empowered girls to participate or lead the student movement.
We have sen such incidents recently in JNU and Jadavpur campus which scrapped the HOKKOLOROB.
I am shocked with the latest development in Wardha Hindi University where a research scholar has been ousted while the investigation in a molestation case lodged by a girl student.The research scholar has been very active in the campus and molestation is yet to be proved.
I appeal everyone to understand the unprecedented critical juncture after the Rhit Vemula and Najib and Hok Kolorob movements as every university campus has been targeted and inflicted.

Sanjiv Chandan has wrote:
और अंततः यौन उत्पीड़न के आरोपी विद्यार्थी को हिन्दी विश्वविद्यालय ने अपने प्राशासकीय संरक्षण से मुक्त कर दिया और उसके निष्कासन का निर्णय अपने विश्वविद्यालय के वेबसाईट पर जारी कर दिया. पत्र नीचे है. यह आरोपकर्ता लडकी और उसके साथियों की बड़ी जीत है.
लेकिन ज़रा गौर करिये निष्कासन की भाषा और निर्णय पर. अभी तो आरोपी छात्र की पीएचडी पर अस्थाई रोक लगाने से वे नकार रहे थे और अभी ही बिना जांच पूरी हुए उसे निष्कासित भी कर दिया. यह विश्वविद्यालय है या कोई घनचक्कर ! सच में इस विश्वविद्यालय को या तो बंद कर देना चाहिए या मर्ज कर देना चाहिए. वैसे भी इसे सरकार ने नन परफार्मिंग यूनिवर्सिटी घोषित कर रखा है, शायद ऐसे ही अधिकारियों और शिक्षकों के कारण.
On the other hand वे खेलते हैं विद्यार्थियों के भविष्य से और विद्यार्थी भूख हड़ताल को विवश ....
तस्वीर में केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार के विद्यार्थी हैं , इनका बीए-बीएड कोर्स 15 दिनों में पूरा होने वाला है , लेकिन कोर्स को मान्यता ही नहीं है. विश्वव
विद्यालय अपना हाथ झाड रहा है, यूजीसी, एमएचआरडी सबके -सब पल्ला झाड रहे हैं.
देश भर में ऐसे कई केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिनके बीए-बीएड कोर्स को मानयता नहीं है
आखिर इन विद्यार्थियों का क्या दोष है. ये तीन दिन से भूख हड़ताल पर हैं.
पूरी खबर पढ़ें:
http://thewirehindi.com/…/students-on-hunger-strike-in-cen…/

Monday, April 17, 2017

`सन् 2000 के अंदर मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से ज्यादा हो जायेगी!’ प्रबीर गंगोपाध्याय

`सन् 2000 के अंदर मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से ज्यादा हो जायेगी!'
प्रबीर गंगोपाध्याय

पुस्तक अंशः

जनसंख्या की राजनीति
फिलहाल तथ्य और कुछ सवाल
प्रबीर गंगोपाध्याय
अनुवादःपलाश विश्वास


सारणी- 8 में हम देख रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में मुसलमानों की वृद्धि दर असीम है। वास्तव में,1961 में वहां मुसलमानों की कोई आबादी ही नहीं थी। 1971 में वहां 28 मुसलमान रहने लगे तो वृद्धि दर अनंत हो गयी। सीमाहीन। असीम।17 जिलों में वृद्धि दर 100 से ज्यादा है।लेकिन उन जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या बेहद कम है। कहीं भी कुल जनसंख्या का 3.3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। सिर्फ दमन अपवाद है, जहां मुसलमान 11.24 प्रतिशत हैं। जिन जिलों में वृद्धि दर 50 से लेकर 99.9 प्रतिशत है, उन जिलों में भी मुसलमानों की जनसंख्या कुल जनसंख्या के दस फीसद से ज्यादा नहीं है।जो औसत प्रतिशत 11.2 से कम है। अपवाद देवरिया (उत्तर प्रदेश), मुंबई और पश्चिम कन्नड़ हैं। इन जिलों में मुसलमान 11.2 प्रतिशत से ज्यादा हैं।
दूसरी तरफ, जिन जिलों में मुसलमानों की संख्या काफी है, कहीं कहीं वे बहुसंख्य भी हैं, उन सभी जिलों में मुसलमानों की वृद्धि दर औसत वृद्ध दर से कम है। कुछ जिलों में तो कुल जनसंख्या के अनुपात में मुस्लिम जनसंख्या घट भी गयी है। सारणी -9 में हम कुछ उदाहरणों पर गौर करेंगे।

सारणी-9 (11)
-------------------------------------------------------------------------------------------------
जिला    जिले की जनसंख्या में           जनसंख्या में कमी वृद्धि         वृद्धि दर
            मुस्लिम प्रतिशत                                                             1961-71
                   1961             1971                                                     (प्रतिशत)
-------------------------------------------------------------------------------------------------
बरमुला          97.30            95.90                   -1.4                             27.16
अनंतनाग      95.20            94.80                   -0.4                             27.42
लक्षद्वीप       98.69           94.37                 - 4.32                            26.19

श्रीनगर          90.60           91.40                  +0.8                            28.44
पूंछ                  *               88.90                     *                                 8.52
मल्लापुरम        *               63.93                     *                               47.98
डोडा             65.00           63.60                 -1.14                             28.21
रजौरी          79.40           61.00                  -18.4                            11.16
मुर्शिदाबाद    55.80          56.30                 +0.54                             29.48
लद्दाख          45.50          46.66                +1.16                              21.99
रामपुर          45.50         46.66                +0.76                              30.59
मालदा         46.10          43.13                 -2.97                              23.24
ग्वालपाड़ा     43.30          42.25                -1.05                               40.57
कछाड़          39.10         39.89                +0.79                               26.78
पूर्णिया         37.25         38.15                +2.02                               34.18
नौगांव         41.20         39.39                 -1.81                               32.62  
मुरादाबाद     37.25         38.15                +0.90                               26.00
बिजनौर       36.40         36.66                +0.16                               25.51
प.दिनाजपुर  39.40         35.89                 -3.51                               27.94
उधमपुर       33.80         32.92                 -0.88                               25.96
सहारनपुर    31.00          31.11                +0.11                               27.31
कोझीकोड    47.20         30.62                -12.08                              33.06
बरेली          29.80         29.20                  -0.60                              17.68
बीरभूम       27.60         29.19                 +1.59                               29.75
कामरुप      29.30         28.93                   -0.37                              36.06
मुजफ्फरपुर 27.90        28.83                   +0.93                             28.64
बहराइच     25.55         26.99                  +1.44                              21.53
हैदराबाद    27.10         26.45                    -0.55                             37.14
माहे             *              24.44                        *                                22.80
जैसलमेर   26.40          24.40                   -2.00                                9.88
कन्नानौर  23.50          24.34                   +0.84                             37.44
24 परगना 23.41         23.68                   +0.27                             36.19
नदीया       24.37         23.34                    -1.03                             24.96
गोंडा         20.90         22.57                   +1.67                              19.99
मेरठ         20.90         22.14                    +1.24                             31.06
पीलीभीत   20.00         21.62                    +0.62                             25.24
पालघाट     28.00         21.27                   -6.73                              17.76

कूचबिहार   23.70         21.25                   -2.45                              23.98
बस्ती        18.60          20.30                  +170                               23.57
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सारणी -9 में हम देखते हैं कि 1971 की जनगणना के मुताबिक देशभर में कुल  9 जिलों में मुसलमान बहुसंख्य हैं। 1961 में वे कुल 7 जिलों में बहुसंख्य थे। इसकी वजह यह है कि पूंछ (जम्मू व कश्मीर) और मल्लापुरम, दोनों जिलों का गठन 1961 के बाद हो गया। बाकी सात जिलों में श्रीनगर को छोड़कर सभी जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या घटी है। इन जिलों में वृद्धि की दर औसत वृद्धि दर से कम है। ग्वालपाड़ा जिले में वृद्धि दर 40.57 होने के बावजूद कुल जनसंख्या के अनुपात में मुस्लिम जनसंख्या 191 से 1971 तक  1.05 प्रतिशत घट गयी। रजौरी जिले में सबसे ज्यादा घटी है मुस्लिम जनसंख्या।
जिन 15 जिलों में मुसलमानों की आबादी घट गयी है, उनके बारे में आंकड़े सारणी -10 में दिये गये हैं।
सारिणी -10 में हम देखते हैं कि लाहौल स्पीति (हिमाचल प्रदेश) में मुसलमान करीब करीब गायब हो गये हैं।1961 में वहां मुसलमान कुल जनसंख्या के 5.96 प्रतिशत थे,1971 में यह अनुपात घटकर 0.12 हो गया है। मणिपुर में मुस्लिम जनसंख्या करीब दो तिहाई घट गयी है। त्रिपुरा के तीन जिलों में मुसलमान करीब 10-15 प्रतिशत घट गये हैं।

सारणी 10 (12)
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जिला                 जिले में जनसंख्या में                       जनसंख्या में           वृद्धि दर
                      मुसलमानों का प्रतिशत                      कमी वृद्धि            1961-71
                       1961              1971                                            (प्रतिशत में)
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लाहौल स्पीति      5.96               0.12                       -5.84                - 97.77
दक्षिण त्रिपुरा     20.10              4.34                      -15.76                - 76.68
मणिपुर दक्षिण    6.20              0.19                        -5.01                - 66.43
कुलु                     *                  0.21                           *                   - 61.20
पश्चिम त्रिपुरा   20.10              6.47                      -13.63                 -54.82
रोपड़                  *                   0.55                          *                      -47.51
जिंद                  *                   1.20                          *                       -31.27

खासी जयंतिया
पहाड़              1.10                0.73                       -0.47                   -24.56
उत्तर त्रिपुरा   20.10               9.38                      -10.72                  -20.72
टिहरी गढ़वाल  0.58               0.48                        -0.10                   -10.79
पुरुलिया         6.00                4.64                        -1.36                    - 8.72       
लुधियाना       0.41                0.40                        -0.01                    -7.69
होशियारपुर    0.50                0.33                        -0.17                     -7.02
चमोली          0.38                0.32                        -0.06                     -1.96
महासु           0.80                0.67                        -0.13                     -1.05
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इस तरह के बदलाव से यह समझने की कोई वजह नहीं है कि यह कुदरत के किसी गैरमामूली कानून के तहत हो रहा है।यानी कि मृत्यु दर जन्म दर के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ गयी होगी।असल में यह सबकुछ जिले से बाहर चले जाने  या जिले में नई आबादी की बसावट की वजह से हुआ है। त्रिपुरा के सेंसस कमिश्नर ने कहा हैः `हम अच्छी तरह जानते हैं कि 1961 से पहले पूर्वी पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) से गैरकानूनी तरीके से कुछ घुसपैठियों के आ जाने से त्रिपुरा में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ गयी थी। इन लोगों की वापसी का नतीजा त्रिपुरा की मुस्लिम जनसंख्या में देखा जा रहा है।’
जिलावार इन आंकड़ों से हमारे लिए जो मसला साफ हो जाता है, वह यह है कि सिर्फ वृद्धि दर से मुस्लिम जनसंख्या के हिसाब किताब से बनी हमारी धारणा हमें एक बड़ी गलती की तरफ खींच ले जायेगी। सिर्फ इन जिलावार आंकड़ों से हम अंदाज लगा सकते हैं कि मुसलमानों की संख्या दरअसल कितनी बढ़ी है। इसके साथ ही हम हकीकत की जमीन पर खड़े होकर यह समझ सकते हैं कि किसी सूरत में मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि की वजह से मुसलामान हिंदुओं के बहसंख्य संख्या को पार नहीं कर सकते।
पिछले तेरह सौ सालों के तथ्यों की पड़ताल करने के बाद यह मालूम पड़ता है कि अखंड भारत में मुसलमानों की आबादी 1941 में सबसे ज्यादा हो गयी थी। तब जेएम दत्त के अनुसार कुल जनसंख्या के 23.81 प्रतिशत या किंग्सले डेविस के मुताबिक 24.28 फीसद मुसलमान थे। हालांकि बहुत लोगों का यह मानना है कि पाकिस्तान की मांग का औचित्य साबित करने के मकसद से 1941 की जनगणना में मुस्लिम जनसंख्या को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया गया था।
फिर अखंड देश के  विभाजन के बाद भारत में मुस्लिम जनसंख्या 9-11 प्रतिशत बना रहा है। दूसरी तरफ,शुरु से हिंदू अस्सी फीसद से ज्यादा बने हुए हैं। आज भी स्थिति वही है। तेरह सौ सालों से अगर जन समुदायों में तरह तरह के बदलाव के बावजूद तस्वीर एक सी बनी हुई है तो अगले तेरह सौ साल में भी इस तस्वीर को पलट देना क्या संभव है? इसका फैसला चिंतनशील पाठकों पर छोड़ दिया जा रहा है।
विश्व हिंदू परिषद का दावा और एक हिसाब

अब हम विश्व हिंदू परिषद के दिये तथ्यों की पड़ताल करेंगे।हमने पहले ही साफ कर दिया है कि उनके आंकड़े सरकारी आंकड़ों से मिलते नहीं हैं। वे मुसलमानों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर बता रहे हैं। तब भी हम देखते हैं कि दिये गये तथ्यों (सारणी-2) के मुताबिक मुस्लिम जनसंख्या 1951 के 3.5 करोड़ से बढ़कर 1981 में 8.5 करोड़ हो गयी है। यानी की मुसलमानों की संख्या  इन तीस सालों में 5 करोड़ बढ़ गयी है। इस हिसाब से हर दस साल में उनकी औसत वृद्धि दर 1.66 करोड़ बनती है। 1981 -2001 तक या बीस साल में अगर इसी दर से वृद्धि होती रही तो मुसलमानों की संख्या बढ़कर 11.82 हो जाती है। दलील बतौर अगर हम मान लें कि मुस्लिम जनसंख्या उन तीस साल की अवधि के मुकाबले दो गुणा भी बढ़ जाये तो भी उनकी संख्या 2001 में 15 करोड़ बनती है। अब हम यह भी मान लें कि इस दौरान हिंदुओं की जनसंख्या में कोई  बढ़ोतरी नहीं हो रही है। तो भी किस गणित से 1971 के 55 करोड़ हिंदुओं के मुकाबले 15 करोड़ मुसलमान बहुसंख्य हो जायेंगे? ऐसा कौन गणित विशारद है, जिनके उपजाऊ दिमाग में इसतरह का अजब गजब गणित बन रहा है!
अब थोड़ा हिसाब जोड़ लिया जाये। 1981 के आंकड़ो में देखा जा रहा है कि भारत में हिंदुओं की जनसंख्या 55 करोड़ है और मुसलमान 7.5 करोड़ हैं। यानी हिंदुओं के मुकाबले में ज्यादा होने के लिए और 48 करोड़ मुसलमान होने चाहिए। जो 7.5 करोड़ मुसलमान भारत में हैं, वे सबके सब बच्चे पैदा नहीं कर सकते। उनमें बच्चे हैं और बूढ़े बूढिया भी हैं। मुसलमानों के बहुत ज्यादा बच्चे होते हैं। मान लीजिये कि इनमें 4.5 करोड़ ब्च्चे और बूढ़े हैं।(14) बाकी 3 करोड़ मर्द और औरतें बच्चे पैदा करने में सक्षम हैं। इस हिसाब से 1.5 मुस्लिम मर्द औरत जोड़ियों को 45 करोड़ बच्चे पैदा करने होंगे। हर जोड़े के लिए यह संख्या 32 होगी। उनकी औसत संतानों की संख्या कुछ कम यानी तीन ही मान लें तो अगर हर  मुस्लिम जोड़ी 35 बच्चे पैदा कर सकें तभी विश्व हिंदू परिषद की चेतावनी सच में बदल सकती है।( यह भी मान लेना होगा कि इस अवधि में हिंदू बच्चे पैदा नहीं करेंगे।)
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